अक्सर कहा करता था मैं
माँ जाऊँगा परदेश को।
“”ना ना वश कर”कहती
माँ को मत कलेश दो।।
दृढ़ संकल्प होकर ऐसा
एक दिन निश्चय कर डाला।
आजिज होकर मान गई
और कहने तू सुन ले लाला।।
खाना पकाना हाथ का खाना
बाहरी को ना हाथ लगाना।
तवे पड़ा रोटी का खुरचन
मेरे ख़ातिर लेकर तू आना।।
साल महीना काट के आया
जब मैया के पास में।
आखिर खुरचन क्यों मंगवाई
बोलो मैया साथ में।।
जली हुई रोटी अच्छी है
कहीं कच्ची रोटी खाने से।
‘विनयचंद ‘तो समझ गया
और कहता आज जमाने से।।
माँ तो माँ होती है इसकी
ममता का कोई हिसाब नहीं।
बच्चों की जाँ तो माँ होती है
करना कभी बुरे बर्ताव नहीं।।
रोटी का खुरचन
Comments
4 responses to “रोटी का खुरचन”
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Good
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👏⚘
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वाह
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Good
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