कुदरत के जहां में ए दोस्त, भ्रष्टाचारो के कमी नहीं।
लोभ हवस में डूबा, किसी को किसी से वास्ता नहीं।।
रिश्ते मे आयी खट्टास कैसे हो गए है आज के इंसान।
पराए घर में आग लगा के कहते है हम वो इंसान नहीं।।
आस्तिक में जीना नहीं चाहते उच्च विचार के नास्तिक।
गर मनोकामना पूर्ण न हो तो कहे भक्ति में शक्ति नहीं।।
विचित्र इंसान
Comments
5 responses to “विचित्र इंसान”
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Good
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वाह
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सुंदर
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Good
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👌👌
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