झम झमा बरखा लागी
ऐ गौ छ चुंमास
डाना काना छाई रौ छ
हरिया प्रकाश।
त्वै बिना यो मेरो मन
नै लिनो सुपास,
घर ऐ जा मेरा सुवा
लागिगौ उदास।
पाणि का एक्केक ट्वॉप्पा
कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता
Comments
20 responses to “कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता”
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छूट गए अंश —-
पाणि का एक्केक त्वाप्पा
कुनेंयीं तू ऐ जा
विदेश बै मेरा सुआ
चुंमास में ऐ जा।
पड़ौसै का परु मौ ले
लिंटर खिति हा छ
हामरा पाथर रडया
च्यून नौ छ अगास।
भैर लगै बारिश छ
भीतर बारिश
आंखां में लै बारिश छ
सब ठौर बारिश।-
👌👌
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bahut sundar rachna
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बहुत खूब
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पूर्णागिरि हमारे चम्पावत जिले में ही है। स्वागत
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हम भी आ रहे भाई के साथ
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मीठी भाषा
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स्वागत, आदरणीया , प्रज्ञा जी
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वाह, कुमाउनी कविता
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धन्यवाद जी
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Achchi kavita
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धन्यवाद जी
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Sundar
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धन्यवाद
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Atisunder kavita
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Sadar Dhanyvad
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Waah, Kumauni me
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Thanks
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ग्रुप में पहली कुमाउनी कविता प्रस्तुत करने पर हार्दिक धन्यवाद जी
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Dhanyvaad
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