कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता

झम झमा बरखा लागी
ऐ गौ छ चुंमास
डाना काना छाई रौ छ
हरिया प्रकाश।
त्वै बिना यो मेरो मन
नै लिनो सुपास,
घर ऐ जा मेरा सुवा
लागिगौ उदास।
पाणि का एक्केक ट्वॉप्पा

Comments

20 responses to “कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता”

  1. Satish Pandey

    छूट गए अंश —-
    पाणि का एक्केक त्वाप्पा
    कुनेंयीं तू ऐ जा
    विदेश बै मेरा सुआ
    चुंमास में ऐ जा।
    पड़ौसै का परु मौ ले
    लिंटर खिति हा छ
    हामरा पाथर रडया
    च्यून नौ छ अगास।
    भैर लगै बारिश छ
    भीतर बारिश
    आंखां में लै बारिश छ
    सब ठौर बारिश।

    1. Harish Joshi U.K

      bahut sundar rachna

    2. Rohit P

      बहुत खूब

  2. Satish Pandey

    पूर्णागिरि हमारे चम्पावत जिले में ही है। स्वागत

    1. हम भी आ रहे भाई के साथ

  3. मीठी भाषा

  4. Satish Pandey

    स्वागत, आदरणीया , प्रज्ञा जी

  5. MS Lohaghat

    वाह, कुमाउनी कविता

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  6. Indra Pandey

    Achchi kavita

  7. Satish Pandey

    धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Sadar Dhanyvad

  8. Kumar Piyush

    Waah, Kumauni me

    1. Satish Pandey

      Thanks

  9. Indu Pandey

    ग्रुप में पहली कुमाउनी कविता प्रस्तुत करने पर हार्दिक धन्यवाद जी

  10. Satish Pandey

    Dhanyvaad

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