बंद खिड़की

तलबगार है ये बंद खिड़की
उस शख्श के दीदार की
जो वादा करके गया आने का
अब हद्द हो चुकी इंतज़ार की

गुज़रती हैं जब भी हवाएं यहाँ से
दर्द की आहट उठ जाती है
चरमराती कराहती हैं बहुत
ये खिड़की बहुत चिल्लाती है

जाम से चुके कब्जे इसके
झुँझलाते किटकिटाते से
उन यादों के झरोखों से
तेरी कोई हूक सी उठ जाती है

आजा की रंग फीके न हो जाएँ
खुलने को आज भी बेताब ये खिड़की
रोशनी भी गुज़रने नहीं देती
कैसी ज़िद पर अड़ी है ये खिड़की

कब आकर खटखटाओगे
कब फिर सतरंगी सपने सजाओगे
आजाओ की आस में परेशान
तलबगार तेरी ये बंद खिड़की
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से

Comments

13 responses to “बंद खिड़की”

  1. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    ‘खिड़की बहुत चिल्लाती है’ में खिड़की का मानवीयकरण अनुपम है| ह्रदय के भावों को जिस प्रकार से खिड़की के माध्यम से आपने व्यक्त किया है वह अनुकरणीय है|

      1. Anita Sharma

        Thank you 🙏🏼

    1. Anita Sharma

      Shukriya vasu

    2. Satish Pandey

      अत्यंत सटीक विश्लेषण , वसुंधरा जी

    1. Anita Sharma

      Thank you

    1. Anita Sharma

      Thanks anshita

  2. हद
    अति उत्तम रचना

    1. Anita Sharma

      Shukriya 🙏🏼

      1. वेलकम

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