बूंद बूंद बूंदें।

बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें

बूंद बूंद बरसती है ,
आंखों से मेरी ।
तूने क्यों की रुसवाई ,
जज्बातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें

तू धूप सा चुभता रहा,
मैं बर्फ सी पिंघलती रही।
तू गाज सा गिरा मुझ पर ,
मैं सब्र सी सहती गई।
नैना ये तरसते हैं,
यादों में तेरी।
कितनी नींद गवाही ,
यादों में तेरी ।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें

पागल मनवा ढूंढे तुझको,
पर तू तो मिलता नहीं।
बेबसी का जाम है तू ,
जाम ये  चढ़ता नहीं।
जाम ये मिलता नहीं।
दिल का बहम मिटा नहीं,
कि तू बेवफा नहीं।
फिर वफा तो की ही नहीं,
हालातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें

बूंद बूंद बरसती है ,
आंखों से मेरी ।
तूने क्यों की रुसवाई ,
जज्बातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें
              ——मोहन सिंह मानुष

Comments

9 responses to “बूंद बूंद बूंदें।”

  1. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    आपकी काव्य रचना सराहनीय है, हमें आपकी दो पंक्तियां बेहद पसंद आयीं –
    तू धूप सा चुभता रहा,
    मैं बर्फ सी पिंघलती रही।

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत बहुत आभार व धन्यवाद 🙏😊

  2. Satish Pandey

    वाह वाह

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      धन्यवाद ,महोदय जी

  3. आँखों।
    बूंद-बूंद बूंदें अच्छा प्रयास

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत बहुत आभार सर समीक्षा के लिए ,आगे त्रुटियों पर थोड़ा और ध्यान दूंगा।

    1. कोई बात नहीं सबसे हो जाता है

  5. Geeta kumari

    सुंदर रचना

  6. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर गीत

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