गांव का मकान रोता तो होगा।
मेरे आने की आस में सोता ना होगा।।
ख़ुद को संभालने की कोशिश करता।
घुट घुट के खंडहर होता तो होगा।।
सिपाही बनकर पड़ा ताला भी।
अब जंग से जंग लड़ता तो होगा।।
बन्द दरवाज़े खिड़कियां सिसकती तो होगी।
पड़ोसियों से थोड़ी आस रखतीं तो होंगी।
कोई तो आए,उन्हें खड़काए फ़िर अंदर बुलाए।
बूढ़ा मकान, फ़िर से जवानी की आस रखता तो होगा।
वो बरामदे में लगा पीपल बुलाता तो होगा।
बचपन को अब भी अपनी डालो में झुलाता तो होगा।।
गांव का मकान बुलाता तो होगा।
गांव का मकान
Comments
6 responses to “गांव का मकान”
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मकान की और मनुष्य की पारस्परिक तुलना प्रशंसनीय है.. यमक अलंकार का भी बहुत सुंदर प्रयोग है। सुंदर रचना
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बहुत खूब
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मानवीय अलंकार यमक अलंकार तथा रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग साथ ही करुण रस वियोग श्रृंगार रस का भी यथा उचित प्रयोग किया गया कवि की कोशिश सराहनीय है
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धन्यवाद
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बहुत खूब
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ग्रेट
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