सबके के सब मिट्टी के मोल है ।
पैसा, धन-दौलत किसके संग है ।
आज जो सड़क का भिखारी है ।
कल वह अपनी मुकद्दर का दाता है ।।1।।
किसका क्या है जहां में ये किसने जाना है ।
जिसने जाना, उसने तब से जिन्दगी संभाला है ।
और के भरोसे जिन्दगी किसने कब-तक जिया है ।
और तो केवल कुछ दिन के मेहमान है, अपना हाथ करतार है ।।2।।
कब-तक जिओगे जिन्दगी घुट-घुट के ।
यूँही कब-तक बर्बाद करोगे समय की इस धारा को ।
बहता चला गया जो हवा लौट नहीं आता है ।
यूँही हाथ मलता रह जाओगे कुछ नहीं पाओगे ।।3।।
पैसा, धन-दौलत सब-के-सब यूँही रह जायेंगे ।
तेरे तन को आखिर कफन से ही लिपटा जायेगा ।
मिट्टी, हवा, आग, आकाश, नीर में तु मिल जायेगा ।
यूँही तेरा सबकुछ भौतिक रत्न तेरे काम नहीं आयेंगे ।।4।।
कवि विकास कुमार
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