लट के श्याम उलझे
केशों की वो चमक अब,
नैनों की नीलिमा अब
होंठों की लालिमा अब,
पतली सी वो कमर अब
बाली सी वो उमर अब
तोते सी नासिका अब
पाने की लालसा अब,
मेरी कलम के विषयों से
दूर हो रही है,
यह आवरण की आभा पे
मौन हो रही है।
आवरण की आभा
Comments
12 responses to “आवरण की आभा”
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वाह क्या बात है
आवरण की आभा 👌👌👌
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सादर धन्यवाद
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बहुत खूब
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सादर आभार
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Sunder
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धन्यवाद जी
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बहुत सुंदर…
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बहुत बहुत आभार
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बहुत ही शानदार
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Thank you
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waah
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Dhanyawad
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