इकतफाक से

सच्चाई को मारने चला था झूठ
आवेग में आकर,
मगर इकतफाक से, सच्च !
कहीं मिला ही नहीं।

Comments

9 responses to “इकतफाक से”

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद नेहा जी

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    शायरी का थोड़ा सा भावार्थ समझाना चाहूंगा सबको–
    सच और झूठ एक दूसरे के विपरीत होते हैं यानि प्रतिद्वंदी।
    सच ,झूठ से नफरत करता है और झूठ ,सच से
    इसीलिए झूठ सच हो समाप्त करने के लिए कोशिश करता रहता है मगर जैसे ही झूठ लोगों के पास जा कर देखता है तो उसे भी हैरानी होती है कि लोगों की जुबान पर केवल वही है ,मतलब झूठ ही रह गया है
    सच तो है ही नहीं कही भी।
    पंक्तियों में झूठ का मानवीकरण किया गया है

  2. Geeta kumari

    सुंदर भाव

  3. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर पंक्तियां

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