माँ तेरी बहुत याद आती है

जब भी कोई उम्मीद कभी, मेरे सर पर हाथ फिराती है ..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
कोई सतरंगी चादर गर, तेरी चूनर सी लहराती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

जब तक तू थी माँ, थाली में, चटनी अचार न खत्म हुई..
हर दिन कुछ अच्छा खाने की, इच्छा दिल में ना दफ्न हुई..
पहले थी फरमाइश पर अब, सूखी सब्जी चल जाती है..
कितनी भी कोशिश कर लूं पर, अक्सर रोटी जल जाती है..
अब हर चिराग हर सूरज और, हर शमा तेरे बाद आती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

बचपन में तूने माँ मेरे, जूतों के फीते बांधे थे..
कितनी ही दुआओं के धागे, तूने वक्त के बीते बांधे थे..
कैसे तेरी हर माँग ऐ माँ, अक्सर पूरी हो जाती है..
मुझको बस इतना बतला दे, तू दुआ कहाँ से लाती है ?
हर बार बनी तावीज़ मेरा, मुझपे जो कोई बात आती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

Comments

10 responses to “माँ तेरी बहुत याद आती है”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बेहतरीन प्रस्तुति

    1. Prayag Dharmani

      धन्यवाद सर

  2. Vasundra singh Avatar

    सुन्दर काव्य

    1. Prayag Dharmani

      बहुत शुक्रिया आपका

    1. Prayag Dharmani

      🙏🙏

    1. Prayag Dharmani

      🙏🙏

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