पपीहे की प्यास

एक पपीहा बैठा खेत में ,
देख आसमान को चिल्लाएं!

बहुत हुआ सब्र ,
अब तो बरस जाओ प्रभु!
मेरी इच्छाओं पर ,
मेरी अभिलाषाओं पर,
थोड़ा तो बरस जाओ प्रभु!

मेरी मेहनत पर ,
मेरी भूख पर,
थोड़ा तो तरस खाओ प्रभु!

साहूकार बड़ा ही जालिम ठेहरा,
रहता हम पर नजरों का पहरा,
नन्ही नन्ही बेटियां! मेरे घर पर,
और खाली पड़ा कनस्तर रोए ,
आंटा कहां से लाऊं प्रभु!

बहुत हुआ सब्र ,
अब तो बरस जाओ प्रभु!

…….मोहन सिंह मानुष

Comments

14 responses to “पपीहे की प्यास”

  1. बहुत खूब

  2. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    बेहतरीन

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत-बहुत धन्यवाद

    2. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत-बहुत धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    कोरोना काल का सजीव चित्रण

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बिल्कुल मैडम जी कोरोना काल पर आधारित भी हम इन पंक्तियों को मान सकते हैं।
      बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏

  4. Prayag Dharmani

    इसे इस समय किसान की व्यथा से जोड़कर भी देखा जा सकता है। सुंदर अभिव्यक्ति

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बिल्कुल प्रयाग सर यह किसान से ही जुड़ी हुई कविता है मैंने यह कविता कुछ समय पहले लिखी थी जब बारिश नहीं हो रही थी। यह एक गरीब किसान जिसका खेती के सिवा कोई और सहारा नहीं होता है , और फिर बारिश के बिना फसल कैसी ,बस किसान के मन की व्यथा है यह कविता
      पपीहा किसान का ही प्रतीक है
      बाकी किसी और इंसान पर भी हम इसे अभिव्यक्त कर सकते हैं

    2. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत-बहुत आभार 🙏 प्रयाग सर

      1. आपका भी आभार इस तरह की संवेदनशील रचना के लिए

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      हार्दिक धन्यवाद शास्त्री जी

  5. बहुत सुंदर रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत बहुत आभार सर

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