खुदगर्ज़ी

‘यही चलन सा हो गया है अब ज़माने का,
हो जो खुदगर्ज़ी तो एहसान घट ही जाता है..
रास्ता कौन बदलता है किसी की खातिर,
जो पेड़ बीच में आता है कट ही जाता है..’

– प्रयाग

Comments

12 responses to “खुदगर्ज़ी”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही उम्दा

    1. Prayag Dharmani

      बहुत शुक्रिया

  2. Geeta kumari

    Very nice

    1. Prayag Dharmani

      शुक्रिया

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