हम तुम्हारी गली में कहां आ गए

हम तुम्हारी गली में कहां आ गए
हम तो गुस्ताख़ हैं जो यहां आ गए,
अब मुहोब्बत हुई है यहां से हमें
जाने का मन नहीं है यहां से हमें।
दिल दुखाकर भगा दो, तभी जायेंगे,
अन्यथा हम कहीं भी नहीं जायेंगे,
हाँ, अगर जायेंगे तो तुम्हें भी वहीं
ले चलेंगे जहां आज हम जायेंगे।
क्योंकि कितनी भी नफरत समेटे रहो,
बन चुके हम तुम्हारे, नहीं जायेंगे।
नफरतों से अधिक प्यार करते हैं हम
प्यार को यूँ हराकर नहीं जायेंगे।
तुम तो दुत्कारते ही रहो यूँ हमें,
फिर भी सम्मान देते रहेंगे तुम्हें
क्योंकि माना है अपना तुम्हें इस जगह,
अब तुम्हें छोड़कर हम नहीं जायेंगे।

Comments

8 responses to “हम तुम्हारी गली में कहां आ गए”

  1. वाह जी वाह, क्या बात है

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Sunder

    1. Satish Pandey

      Thanks

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सुन्दर

    1. Satish Pandey

      Thanks

  4. Devi Kamla

    बहुत खूब पाण्डेय जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

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