हे प्राणदायनी नारी

हे प्राणदायनी नारी
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हे प्राणदायनी नारी,तेरी करूण कहानी
आँचल में है करूणा,पर आखों में पानी ।
हर युग में क्यू नारी ही सतायी जाती है
विरह वेदना सहती,अग्नि में उतारी जाती है
कदम -कदम पर सहती,सबकी मनमानी ।
तेरी करूण कहानी—
स्नेह की डोर से बँधकर,आई है तेरे द्वारे
एक प्रीत निभाने ख़ातिर,त्यागे सपने प्यारे
अलग कहाँ है तुमसे,है तेरी अर्धांगनी
तेरी करूण कहानी—
पाँच पतियों की द्रोपदी,उसमें उसका कोई दोष नहीं चौसर पर दांव लगा बैठे,धर्मराज को कोई होश नहीं
पति की करनी,वेश्या कहाती रानी
तेरी करूण कहानी—-
अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले,पत्नी से छिपकर भागे
विरह- वेदना का दुख, क्यू रखा यशो के आगे
क्यू बनी वह दर्द की अधिकारिणी
तेरी करूण कहानी—–

सुमन आर्या

Comments

10 responses to “हे प्राणदायनी नारी”

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    1. Suman Kumari

      Thanks

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  3. बहुत सुंदर

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  4. बहुत सुंदर लेखनी

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