तुम्हें नहीं मालूम…

तुम्हें नहीं मालूम ,
मगर मंसूबों को तेरे ,
मैं जान लेता हूं,
रहता हूं परेशान,
मगर; फिर भी
खुद को हर हाल में ,
संभाल लेता हूं,
और इत्तेफाक से
तुम्हारी आंखों और
लफ्जों का तालमेल,
बिगड़-सा गया है आजकल ,
बस !इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं,
इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं।

Comments

20 responses to “तुम्हें नहीं मालूम…”

  1. वाह क्या बात है
    सुन्दर रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत बहुत आभार 🙏

  2. जितनी तारीफ करूँ कम है

    in fact इस महीने आपकी सबसे सुन्दर रचना
    यह मेरे विचार हैं बस

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏🙏🙏🙏

  3. Prayag Dharmani

    ‘लफ़्ज़ों का तालमेल बिगड़ सा गया है आजकल’ बहुत अच्छी लाइन है..इस सुंदर रचना के लिए आप बधाई के पात्र है

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत बहुत आभार प्रयाग जी 🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  4. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      हार्दिक धन्यवाद 🙏

  5. Satish Pandey

    बहुत ही सुंदर, आपकी लेखनी को सैल्यूट

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      बहुत बहुत धन्यवाद सतीश सर 🙏🙏
      ऐसे ही प्रेम बरसाते रहे हैं और हौसला बढ़ाते रहें हैं

  6. Pratima chaudhary

    Nice

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद

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