तोड़ दो पत्थर उठा कर
कांच का दिल तुम हमारा
ना रहेगा दिल न होगा
दिल्लगी का भी सहारा।
तोड़ दो पत्थर उठा कर
Comments
11 responses to “तोड़ दो पत्थर उठा कर”
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बहुत दर्द और गहराई है आपकी रचना में, वाह!
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समीक्षा हेतु, सादर अभिवादन, आपने दर्द की अनुभूति की, धन्यवाद जी
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Welcome
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सुंदर
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सादर धन्यवाद जी
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद जी
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बहुत अच्छे
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सादर धन्यवाद जी
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बहुत बढ़िया
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Thank you जी
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