तोड़ दो पत्थर उठा कर

तोड़ दो पत्थर उठा कर
कांच का दिल तुम हमारा
ना रहेगा दिल न होगा
दिल्लगी का भी सहारा।

Comments

11 responses to “तोड़ दो पत्थर उठा कर”

  1. बहुत दर्द और गहराई है आपकी रचना में, वाह!

    1. समीक्षा हेतु, सादर अभिवादन, आपने दर्द की अनुभूति की, धन्यवाद जी

      1. Geeta kumari

        Welcome

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर

    1. सादर धन्यवाद जी

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी

  4. बहुत अच्छे

    1. सादर धन्यवाद जी

  5. बहुत बढ़िया

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