मेरा गाँव
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गाँव मेरा, हां वही गाँव है
जहाँ सर्दी में धूप,गर्मी में शीतलता की छाँव है ।
अपनेपन का हर जङ चेतन से व्यवहार है
हर गली हर टोले में छिपा अब भी प्यार है
एक आवाज़ पे दौङ पङता है जो
बना भारत की पहचान है हा वही गाँव है ।
मगही बोली में घुली मिस्री की मिठास है
गोबर से लिपी गलयो में खुशबू का वास है
खेतों में लहराती फसल,पगडंडियो पे मखमली घास है
मन में कोई भेद नहीं,बालमन में गोकुल का रास है
हर डाली पे कोयल तीतर बटेर मैना का ठाव है
आने का संदेश देता कौवा का काव काव है ।
सुमन आर्या
मेरा गाँव
Comments
10 responses to “मेरा गाँव”
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👌👌
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सादर धन्यवाद
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बहुत सुंदर पढ़ते ही गांव की सुंदर कल्पना सामने आ जाती है👏👏
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सादर आभार
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बहुत सुंदर
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गांव की प्राकृतिक सुंदरता की अति सुंदर प्रस्तुति
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सुंदर
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वाह बहुत ही सुन्दर काव्यधारा प्रवाहित हो रही है, आपकी लेखनी अपने मे प्रखरता समेटे हुए है।
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सादर धन्यवाद
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Very nice
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