मौत की नींद

बेजान नजरे जा टिकी थी
उसके चेहरे पर
जब जिस्म से जान ये
जुदा हो गई
तड़प रहे थे हम
मरने के बाद भी
यह मासूम आंखें
किस कदर रो गई
दिल तो किया
फिर जी उठूँ और पौंछ दू
उन आंखों को
जीवन का एक घोर दरख्त
मैं सहेजू प्रेम की सॉखों को
पर लौट के वापस आ ना सके
मौत की इस दुनिया में
इस कदर खो गए
फिर चाह कर भी जागना सके
मौत की नींद हम जब सो गए

Comments

12 responses to “मौत की नींद”

  1. Suman Kumari

    अपनों के बिछङने का दर्द ही कुछ ऐसा है, लब्ज़ मिलते नहीं अश्क चेहरे को भिगोता है ।

    1. धन्यवाद आपका

  2. Geeta kumari

    मृत्यु के बाद का सजीव और संजीदा वर्णन।
    सुंदर प्रस्तुतीकरण

  3. वाह काफी खूबसूरत

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