हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत,
बस किताब के कोरे पन्ने थे ,
लिखते रहे अपनी रूबानी,
जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म,
फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।
हैसियत क्या थी मेरी…
Comments
14 responses to “हैसियत क्या थी मेरी…”
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बहुत खूब प्रतिमा जी
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Vah vah
Bahut khub-

धन्यवाद
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वाह
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धन्यवाद
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NICE
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धन्यवाद जी
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कम शब्दों में बहुत गहराई वाले भाव
बहुत ही लाजवाब-

🙏🙏
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बहुत खूब
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bahut sundar….
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bahut sundar
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धन्यवाद
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