ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी ! कभी तो तू मेरी होती
जिधर को मैं कहती, उधर रूख़ करती ।।

तू जिधर इशारा करती, मुङ जाते हैं उधर
तेरे आगे अपनी मर्जी चलती है किधर
काश! बस एक बार मेरा अनुसरण करती।

थक गये हैं, तेरी इच्छाओं की कद्र करके
भीगी है पलकें मेरी, उभरे हैं जो दर्द बनके
इस पीङा की अनुभूति तू भी जिया करती ।

पथ पर पथिक बहुत हैं पर,अपनी-अपनी मंजिल है
कहाँ मिलता है सबको , जो जिसके काबिल है
मनचाही मंजिल का फिक्र,तू भी करती ।

Comments

18 responses to “ऐ जिन्दगी”

  1. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर रचना

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    हृदय स्पर्शी पंक्तियां।

    1. Suman Kumari

      आपकी टिप्पणी उससे भी ज्यादा खूबसूरत हैं ।सादर आभार ।

      1. Welcome n Thank you suman ji.

  3. Satish Pandey

    पथ पर पथिक बहुत हैं पर,अपनी-अपनी मंजिल है
    कहाँ मिलता है सबको , जो जिसके काबिल है,
    आपकी कविता का भावपक्ष अत्यंत मजबूत है,
    कलापक्ष भी अपनी सुंदरता लिए हुए है, वाक्यांत और तुक का सुन्दर समन्वय है ,
    बहुत खूब

    1. Suman Kumari

      सादर आभार ।

      1. Suman Kumari

        तमाम पक्षो को अपनी टिप्पणी में पिङोने के, बहुत बहुत धन्यवाद ।

  4. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बेहतरीन

    1. Suman Kumari

      सादर आभार सर

  5. Praduman Amit

    काश ऐसा ही होता।

    1. Suman Kumari

      हाँ, अमीतजी
      यदि ऐसा ही होता
      तो शायद यह जहाँ
      अब से भी ज्यादा खूबसूरत होता ।

  6. Suman Kumari

    सादर आभार

  7. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    “पथ पर पथिक बहुत हैं पर,अपनी-अपनी मंजिल है
    कहाँ मिलता है सबको , जो जिसके काबिल है
    मनचाही मंजिल का फिक्र,तू भी करती ।”
    बहुत सुंदर पंक्तियां
    जिंदगी किस मोड़ पर ले जाएं किसी को कुछ नहीं पता,
    हम क्या सोचते हैं और क्या होता है उसका कोई अनुमान नहीं होता, कभी-कभी अच्छा भी होता है और कभी बुरा भी।
    बहुत ही सुंदर भाव
    बेहतरीन प्रस्तुति

  8. वाह क्या बात है

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

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