जनवरी से दिसंबर गुजर गए,
उस बेख़बर को खबर ही नहीं।
उसे क्या पता इश्क़ करने वाला
कोई आशिक़ ज़िंदा है भी या नहीं।।
बेख़बर
Comments
6 responses to “बेख़बर”
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आपकी शायरी में अंतर्निहित मर्म विरह वेदना को सामने लाने में समर्थ है। श्रृंगार के वियोग पक्ष को प्रकट करती यह शायरी बहुत सुंदर है।
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सुंदर
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विरह वेदना को प्रकट करती सुन्दर पंक्तियां
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बहुत ख़ूब।, सुंदर प्रस्तुति
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बहुत खूबसूरत
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बहुत खूब
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