न जुदाई का भय हो

ठीक कहा तुमने
पायें यदि मानव तन
अगले जनम में,
या बनें, कीट, पतंग,
जंगली जानवर,
अपनों के बीच
अपने हो सकने वालों
के बीच ही जनम पायें।
न जुदाई का भय हो
न दूर चले जाने का गम
न परम्परा की बंदिशें हों
न रूढ़ि की रूढ़िवादिता हो।
बस एक हो पाने में
सरलता ही सरलता हो।

Comments

16 responses to “न जुदाई का भय हो”

  1. Pratima chaudhary

    सुन्दर भाव

    1. सादर धन्यवाद जी

  2. Geeta kumari

    क्या बात है कवि ने तो अगले जनम तक की कल्पना कर ली🤔
    सुन्दर प्रस्तुति ..

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, गीता जी, सादर अभिवादन

  3. वाह वाह, बहुत ही गजब

    1. धन्यवाद जी

    1. बहुत धन्यवाद

    1. सादर नमस्कार, धन्यवाद

  4. ओफ्फो…
    इतना आगे का सोंच लिया

  5. गजब की पंक्तियाँ

    1. बहुत धन्यवाद जी

  6. बढ़िया, very nice

    1. धन्यवाद जी

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