है हिदायतें देती मां मुझे।
घर जल्दी आना बेटी देर न करना।
मैं सोचती हूं अक्सर!
क्या यह देश मेरा घर नहीं!
क्या यह लोग मेरा परिवार नहीं!
फिर क्यों नहीं सुरक्षित ,
मैं अपने ही घर में।
या है यह देश पराया।
है हिदायतें देती मां मुझे।
रात के अंधेरे से बचना बेटी,
सुनसान अंधेरी गलियों से दूर रहना बेटी।
मैं अक्सर यह सोचती हूं!
यह अंधेरी गलियां क्यों नहीं जगमगा उठती।
हम बेटियों के गुजरने से।
घर का अंधेरा हम अक्सर,
रौशनी से दूर कर देते हैं।
पर अंधेरी गलियां कब रौशन होगी!
मैं सोचती हूं अक्सर।
क्यों चीख रह जाती है,
अंधेरों के बीच।
अब भी मुझे,
यही लगता है।
अगर यह देश,
बेटियों का घर ना बन पाया।
तो रहेगा अफसोस यही,
घर वह है जो सुकून और चैन देता है।
है हिदायतें देती मां मुझे।
हिदायतें देती मां मुझे….
Comments
14 responses to “हिदायतें देती मां मुझे….”
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बहुत सुंदर विचार हैं आपके, सचमुच ऐसा ही हो तो हर समस्या का हल हो जाये
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इतनी सुंदर समीक्षा के लिए बहुत-बहुत आभार
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अतिसुंदर रचना
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हार्दिक धन्यवाद सर
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समाज में जो कमियां हैं उन्हें सुधारने की बजाए हम महिलाओं पर पहरें लगाते हैं ,बंदिशें लगाते हैं जिसमें महिलाओं का कोई दोष नहीं होता है
बहुत ही सुंदर एवं यथार्थपरक भावों का समावेश
बहुत ही उम्दा लेखनी-

कविता के भाव को थोड़े शब्दों में बता देना आपकी समीक्षा को अच्छे से आता है बहुत-बहुत आभार सर
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बहुत सुंदर विचार
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सादर धन्यवाद
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Awesome line
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Thank you
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मुक्तक से मैं अत्यंत प्रभावित नहीं होता परंतु यह हृदयस्पर्शी है।
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Sahi kaha…
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Thank you
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