12 Comments

  1. बहुत ही सुन्दर कविता है सतीश जी ” जिस तरह चांद खिलता है,कभी कुछ दिन महीने में, उसी की भांति तुम भी हो । जो हंसते हो महीने में “।
    श्रृंगार रस से परिपूर्ण अति सुंदर कविता ।

    1. सादर अभिवादन। इस सुंदर और लाजवाब समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद गीता जी। आपकी समीक्षा प्रेरणादायी है। जय हो

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