कांटों सी क्यों चुभन रखूं
जब मिट्टी में मिल जाना है,
कभी किसी ने कभी किसी ने
निश्चित ही है जाना है।
फूलों सी खुशबू फैला दूं
जिधर चलूँ उधर महका दूँ,
प्यार का बीजारोपण करके
नफरत सारी दूर भगा दूँ।
कांटों सी क्यों चुभन रखूं
Comments
5 responses to “कांटों सी क्यों चुभन रखूं”
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अतिसुंदर भाव अतिसुंदर रचना
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सादर धन्यवाद
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फूलों सी खुशबू फैला दूंजिधर चलूँ उधर महका दूँ,
प्यार का बीजारोपण करके ,नफरत सारी दूर भगा दूँ। ….बहुत सुंदर भाव और अति ख़ूबसूरत प्रस्तुति। काबिले तारीफ़ रचना।-
इस सुन्दर समीक्षा हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद। यह समीक्षा प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक है। जय हो
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Nice
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