पर्वतीय सौन्दर्य

सिक्किम के सौन्दर्य का,
मैं कैसे करूं बखान
वहां से लेकर हम यादें,
आए अद्भुत, आलीशान
स्वर्णिम सूर्य उदित होते हैं,
पर्वतों के पार
बनते बादलों की छटा है,
सुन्दर अपरम्पार
झरने झर-झर बहें यहां पर,
शीतल पवन का शोर
सुन्दर हरियाली बिछी हुई है,
यहां पे चारों ओर
कंचन जंगा की बर्फीली चोटी,
के दर्शन यहां हो जाते हैं
बादल खेलें आंख-मिचौली,
बरस कभी भी जाते हैं
पर्वतों से कुछ प्यार सा है,
पर्वत सदा ही भाते हैं
जब करता है दिल कभी,
पर्वतों से मिलने चले जाते हैं ..

*****✍️गीता

Comments

12 responses to “पर्वतीय सौन्दर्य”

  1. प्रकृति का सुंदर व मनोहर चित्रण
    कलम ने आज जादू कर दिया आपकी…

    1. कया बात । हौसला अफजाई के लिए आपका। शुक्रिया मैम बहुत सुंदर टिप्पणी मिली है ।खुश कर दिया ।

  2. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    गीता जी के गीत
    ले सबके दिल जीत

    1. बहुत बहुत धन्यवाद एवम् आभार आपका राजीव जी🙏

  3. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    अति सुंदर वर्णन
    प्रिय गीत

  4. Satish Pandey

    बहुत ही सुंदर। कवि गीता जी ने इस कविता में प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर, चित्रण किया है।
    झरने झर-झर बहें यहां पर,
    शीतल पवन का शोर
    बहुत ही सुंदर अलंकारिक पंक्तियाँ काव्य में चार चाँद लगा रही हैं।
    अद्भुत चित्रण वाह

  5. Geeta kumari

    इतनी सुन्दर समीक्षा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी 🙏
    जो देखा था उसी का वर्णन किया है । सचमुच अद्भुत दृश्य ही था वो ।

  6. बहुत बहुत बढ़िया

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद सर 🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏

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