संतान

माया को रचा हमने
प्यार का दीप जलाया
जिनका था सहारा हमें
उन्हें ही किया बेसहारा

गौ माता को पूजते तब तक
जब तक अमृत धार बहाती
यही स्वार्थ की अंधी भक्ति
अपनों से हमें दूर कर जाती

रिश्तेदारों से सम्बन्ध तभी
जब तक धन वे लुटाते
कार्य सिध्ध होते ही अपने
जाने लुप्त कहाँ हो जाते

फिर से ये निस्तेज शक्ल
उनको तभी हैं दिखाते
जब नयी वासना के लिए
धन थोड़े कम पड़ जाते

अपने भी बन जाते सपने
ये शौख जिन्हे हो जाते
अहसानो को भूल उन्हें बस
अपनों के धन याद रह जाते

उनसे अब रिस्ता ही कैसा
माँ को जिसने भुलाया
अब भी प्रार्थना करती नित
संतान को कौन भूल पाया

ऐसे सन्तानो की प्रभु कभी
शक्ल न किसी को दिखाए
शक्ल दिखाने को जो अपनी
माता को सदा तरसाये

जरुरत पड़ने पर ही जिसको
भाई माँ बाप की याद आये
स्वयं सुखों को दूर अपनाये
अपनों के धन को हर्षाये

संतान वही जो क्षण भर को
माँ बाप को भूल न पाए
किसी की नन्ही अहसानो को
जीवन भर भूल न पाए

जिसने उसको संसार दिया
उस पर सर्वस्व लुटाये
जान पर भी है हक़ जिसका
हक़ के लिए न उसे बिसराये

Comments

3 responses to “संतान”

  1. Geeta kumari

    इस लोभी दुनियां में यही तो सब होता है , बहुत सुंदर पंक्तियां राजीव जी.

    1. हृदयतल को छूती रचना

  2. हृदयतल को छूती रचना

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