कविता- सभी सो रहे
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सभी सो रहे हैं,
घरों में पड़े हैं|
हम ही हैं दीवाने,
अभी जग रहे हैं|
बड़ा दुख है हमको
जो जग रहे हैं।
दिखे ना किनारा,
चले जा रहे हैं।
सभी के घरों पर,
समय पर है भोजन|
हम है छात्र,
धुले ना है बर्तन|
बजे बारह रात जब,
सब्जी बन रही है|
लिए हाथ कॉपी,
पढ़ाई हो रही है|सभी…..
कई वर्ष बाद में,
पेपर है आया|
नकल हुआ भारी,
न्यूज़ पेपर रद्द बताया|
बड़े-बड़े माफिया,
नकल कराते हैं
रिश्ते में पड़कर टीचर,
वजूद बेच देते हैं|
देख के घटना हम
बैठे रो रहे हैं |सभी…
हमारा क्या होगा,
पापा कर्ज भर रहे,
छात्र जीवन में,
कुछ भूखे सो रहे |
छोटे-छोटे रुम में,
कई रह रहे हैं|
डिग्री भी भारी लेकर,
जहर खा रहे क्यूं|
PHD धारी देखो,
बेरोजगार क्यूं|
नेता सभी बैठे,
मजा कर रहे हैं|
अपराधी माफिया,
मंत्री बन रहे हैं|सभी….
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’
सभी सो रहे
Comments
11 responses to “सभी सो रहे”
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अति सुन्दर भाव और सम सामयिक यथार्थ चित्रण किया है कवि ऋषि जी ने
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Tq❤🙏👌
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बहुत सुंदर ऋषि वाह
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Tq sir 🙏❤
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बहुत खूब
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Tq sir🙏
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बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति
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Tq
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सुंदर तथा यथार्थ अभिव्यक्ति..
आपने काव्य पाठ में चार चाँद लगा दिये-
Tq
ऐ आप की महानता है प्रज्ञाजी, चार चांद तो आप ने लगाया था कविता पढ़कर ,हमें बहुत अच्छी
थी आप की रचना-

आभार आप सहृदय हैं इसलिए ऐसा कह रहे हैं
बाकी मेरी नजर में मेरा परफार्मेंस सबसे खराब था.. क्योंकि हड़बडा़हट में पता नहीं क्या-क्या बोला मैंनै..
अगली बार बेहतर करूंगी…
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