देवकी-नन्दन कृष्ण कन्हैया
गोकुल में विराजे हैं
नन्द-यशोदा के लाडले,
मोर मुकुट, कानों में कुण्डल
हस्त मुरलिया साजे है
कुपित होकर इन्द्र ने
जब जल बहुल बरसाया था,
कनिष्ठा पे कृष्ण ने,
गोवर्धन गिरि उठाया था
इन्द्र कुपित थे…
अपनी अवहेलना से
गोवर्धन की पूजा हुई थी,
बदले में उनकी पूजा के
द्वापर युग में, इन्द्र ने,
रौद्र-रूप दिखलाया था
जल बहुत बरसाया था
हुई थी भारी-भरकम वर्षा,
कई दिवस की रात
बृजवासियों का तब,
कान्हा ने दिया था साथ
उनकी रक्षा करने हेतु,
कान्हा ने, गोवर्धन-गिरि उठाया
तभी से कान्हा जी ने,
गोवर्धन-धारी नाम पाया
इन्द्र-देव ने हार थी मानी,
यही है गोवर्धन-पूजा की कहानी
*गोवर्धन पूजा की कहानी*
Comments
5 responses to “*गोवर्धन पूजा की कहानी*”
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बहुत सुंदर भाषा में
आपने गोवर्धन पूजा की महत्ता बताई है 👏👏👏 -
इस समीक्षा गत टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा
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good
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अतिसुंदर रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏 सादर प्रणाम
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