शिकवों के पुलिंदे….

यादों के पंख फैलाकर
सुनहरी रात है आई
उन्हें भी प्यार है हमसे
सुनने में ये बात है आई
पैर धरती पे ना लगते
उड़ गई आसमां में मैं
जीते जी प्रज्ञा’ देखो
स्वर्ग में भी घूम है आई .
चाँद पर है घटा छाई
गालों पर लट जो लटक आई…
सजती ही रही सजनी
सजन की प्रीत जो पाई
मिलन की आग में देखो
जल गये शिकवों के पुलिंदे,
पीकर नजरों के प्याले
प्रज्ञा बन गई मीराबाई…

Comments

11 responses to “शिकवों के पुलिंदे….”

  1. Deepak Singh

    वाह, बहुत खूब |

  2. Geeta kumari

    बहुत खूब लाजवाब अभिव्यक्ति

  3. Praduman Amit

    वाह ।आप मीराबाई भी बन जाती है।

  4. Virendra sen Avatar

    बहुत सुंदर

  5. उम्दा अभिव्यक्ति

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