मन उड़ान तेरी
पंखों बिना चलती रही,
उस तरफ फिर इस तरफ
सब तरफ बहती रही।
चैन आया हो कहीं
ऐसा नहीं संभव हुआ,
एक स्थल पर न टिक पाया
फिरा विस्मित हुआ।
आज मीठा रास आया
और कल भाया नहीं
फिर नमक की चाह आई
तृप्त हो पाया नहीं।
जिन्दगी भर दौड़ चलती ही रही
उलझाव की,
जिंदगी का कब समय बीता
समझ पाया नहीं।
मन उड़ान तेरी
Comments
10 responses to “मन उड़ान तेरी”
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Very nice poem
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Thank you
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अति सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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उम्दा लेखन व लयात्मकता
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बहुत बहुत आभार
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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सादर आभार
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