ठंड बढ़ती जा रही है

ठंड बढ़ती जा रही है
वह सिकुड़ता जा रहा है
रात भर सिकुड़ा हुआ
तन अकड़ता जा रहा है।
सिर व पैरों को मिलाकर
गोल बन सोने लगा,
नींद फिर भी दूर ही थी
क्या करे, रोने लगा।
यूँ तो मौसम सब तरह के
कुछ न कुछ मुश्किल भरे हैं,
ठंड की रातों के पल पल
और भी मुश्किल भरे हैं।
छांव होती गर तुषारापात के
पाले न पड़ता,
काट लेता ठंड के दिन
इस तरह जिंदा न मरता।
पांच रुपये जेब में थे
पेटियां गत्ते की लाया
मानकर डनलप के गद्दे
भूमि पर उनको बिछाया।
क्या कहें ठंडक भी जिद्दी
भेदकर गत्तों का बिस्तर
आ रही थी नोचने तन
बेबस था वह फुटपाथ पर।
—— सतीश चंद्र पाण्डेय

Comments

14 responses to “ठंड बढ़ती जा रही है”

  1. बेहतरीन कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

  2. बेहतरीन कविता

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. निर्धन की सर्दी का बेहतरीन चित्रण

    1. Satish Pandey

      Bahut bahut dhanyawad

  4. Praduman Amit

    ठंड से बच के निकल जाए, जमाने में किसका मजाल है।
    क्या अमीर क्या गरीब सभी को देखिए एक ही हाल है।।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. सोंचनीय रचना

    1. Satish Pandey

      सराहना हेतु साधुवाद

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