कविता: मनमर्जियाँ

चाहती हूँ एक कविता लिखना
मगर नाकाम हो जाती हूँ
विषय चुनने के लिए
छटपटाती हूँ
शब्द कुछ ऐसे हों
भावनायें मेरी व्यक्त करें
और कह दें
वह जो मैं कह नहीं पाती हूँ
निरर्थक है लेखन
जब तक भाव ना सिमटें
कविता में,
पल्लवित ना हों इरादे
प्रस्फुटित ना हों आकांक्षाएं और
ना चल पायें
मेरी मनमर्जियां….

Comments

8 responses to “कविता: मनमर्जियाँ”

  1. बहुत खूब, उम्दा पंक्तियाँ

  2. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    रचनाकार की छटपटाहट का रचना के माध्यम से सटीक अभिव्यक्ति

  3. This comment is currently unavailable

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