सौ दीप जला लो मंदिरों में,
चाहे हजार दीये जले तेरे आँगन में,
जब-तक तेरे मन की तम ना होंगे दुर ।
तब-तक है तेरे सारे दीये की रौशन सुन ।।
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एक दीप जलाओ ऐसा
जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
एक दीप जलाओ ऐसा
जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
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एक दीप जलाओ ऐसा
जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।1।।
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झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
जब तक कर्म फल में तेरी आसक्ति रहेगा
ये फल की इच्छा तुम्हें चैन से सोने न देगा
झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
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एक दीप जलाओ ऐसा
जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।2।।
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है सभी समस्याओं का निवारण दाता के नाम में
मन का विकार हटता सिर्फ ब्रह्मचर्य-पालन से
ब्रह्मचर्य एक परम साधना है,
जिसके करने से सब पाप मिटता है
ब्रह्मचर्य एक परम दीप है -2
जिसे तुम्हें अपने उर में जलाना है ।।
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एक दीप जलाओ ऐसा
जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।3।।
कवि विकास कुमार
एक दीप जलाओ ऐसा
Comments
4 responses to “एक दीप जलाओ ऐसा”
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बहुत खूब
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बिल्कुल सही लिखा है आपने
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बहुत ही सुंदर रचना
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सुंदर
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