आंख से बह चली,
अश्रु की बूंद कुछ कह चली
तुम तो क्रोध कर गए,
मैं सब कुछ सह चली
नयनों से बह चली
अश्रु बूंद कुछ कह चली
तुम तो स्नेह में भीग उठे
मैं ओस की बूंद सी बह चली
तुम्हारी जुदाई सह गए
हम तो रोते ही रह गए
आंसुओं की कीमत तुम क्या जानो,
यह आंखों की नमी है
ना सिर पर आसमां है,
ना पैरों तले ज़मीं है
कहने को नेत्रनीर हैं
पर देते बहुत ही पीर हैं
और कहने को क्या बचा है,
जब से तुमसे दिल लगा है
_____✍️गीता
अश्रु की बूंद
Comments
8 responses to “अश्रु की बूंद”
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बहुत सुंदर लाजवाब
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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बहुत ही सुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद संदीप जी
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अतिसुंदर भाव
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी आभार🙏
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वाह रुमानी कविता
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समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी
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