रिक्शा

एक निर्जीव -सी मोटर गाड़ी ।
शानो शौकत की बनी सवारी।।
ये भी मांगे तेल और पानी।
घिस गए पुर्जे हुई पुरानी।।
अपने जैसा वंदा अखीर।
खीचे रिक्शा लगा शरीर ।।
एक अकेला खींच रहा हो।
हम बैठे हो आखिर दो दो।।
खून पसीना बहा रहा है।
रामू से रिक्शा कहा रहा है।।
शर्म नहीं आती क्यों हमको।
न उचित मजूरी देते उसको।।
‘विनयचंद ‘ वो भी मानव है
उसका नित सत्कार करो।
उसका भी एक परिवार है
,सेवक बन आधार बनो।।

Comments

3 responses to “रिक्शा”

  1. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर रचना है कवि विनय चंद शास्त्री जी ने अपनी कविता के माध्यम से समाज को संबोधित करते हुए कहा है कि निर्धन व्यक्ति पर दया भाव दिखाना चाहिए और उसकी उचित मजदूरी उसको दे देनी चाहिए ।….”अपने जैसा वंदा अखीर। खीचे रिक्शा लगा शरीर ।।
    वो भी तो एक इन्सान है .. इंसानियत का पाठ पढ़ाती हुई बहुत उम्दा रचना

  2. Satish Pandey

    उसका नित सत्कार करो।
    उसका भी एक परिवार है
    ,सेवक बन आधार बनो।।

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ। यथार्थ से आदर्श की ओर जाती बेहतरीन रचना।

  3. Anu Singla

    बहुत सुन्दर विचार हैं आपके, सुन्दर भाव

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