इंसान तेरे रूप अनेक

इंसान तेरे रूप अनेक
कोई ईमानदारी का प्रतीक
कोई बेमानी की मिसाल,
कोई जलता दीपक मंद करता है
कोई जलाता है मशाल,
कोई शांति का प्रतीक
कोई करता है बवाल
कोई बेशर्मी की हद पार करता है
कोई रखता है मुंह में रुमाल।
कोई निष्क्रिय रहता है
कोई करता है कमाल।
कोई खुद का ही पेट भरता है
कोई जरूरत मंद के लिए सजाता है थाल,
कोई कर्म से परिचय देता है
कोई बजाता है गाल।
कोई दूसरों के लिए
मार्ग खोलता है
कोई दूसरों के लिए
रचाता है भंवरजाल।
इंसान तेरे रूप अनेक
कभी सहेजता रिश्तों को
कभी देता है फेंक।

Comments

14 responses to “इंसान तेरे रूप अनेक”

  1. बहुत बढ़िया, वाह

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  2. वाह बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  3. बहुत सुन्दर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. Geeta kumari

    इंसान तेरे रूप अनेक
    कोई ईमानदारी का प्रतीक
    कोई बेमानी की मिसाल,
    कोई जलता दीपक मंद करता है
    कोई जलाता है मशाल,
    _______इंसान की यह खासियत है कि प्रत्येक इंसान दूसरे से भिन्न है इसी इन्सानी फितरत को इतने अच्छे प्रकार से समझाती हुई कवि सतीश जी की जीवन दर्शन करवाती हुई बहुत सुन्दर कविता। भाव और कला पक्ष बेहद मजबूत है,कविता पाठक को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है

    1. Satish Pandey

      कविता के भाव को समझने व सुन्दर विश्लेषण हेतु बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद सर

  5. बहुत खूब वाह

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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