ITNA ACHACHA YA BURA NAHI HOON

इतना अच्छा या बुरा नहीं हूँ,
जितना कि दुनिया कहती है ।
मैं कैसा हूँ, ये सिर्फ व सिर्फ मैं जानता हूँ ।।
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मैं खूद के सवालों के कठघड़े में सदा खड़ा रहता हूँ
औरों की नजरों में, मैं क्या हूँ, ये औरों का सवाल है,
मेरा नहीं, मैं क्या हूँ, ये सिर्फ व सिर्फ मैं जानता हूँ ।।
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जय श्री सीताराम
कवि विकास कुमार

Comments

3 responses to “ITNA ACHACHA YA BURA NAHI HOON”

  1. बहुत ख़ूब

  2. Satish Pandey

    मैं खूद के सवालों के कठघड़े में सदा खड़ा रहता हूँ
    औरों की नजरों में, मैं क्या हूँ, ये औरों का सवाल है,
    मेरा नहीं, मैं क्या हूँ, ये सिर्फ व सिर्फ मैं जानता हूँ ।।
    —- आदर्शात्मक स्थिति की बहुत सुंदर काव्य रचना। सुन्दर युवा सोच।

  3. वाह वाह क्या बात है

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