10 Comments

  1. किस मोड़ पर मंज़िल
    कर रही है इन्तज़ार,
    क्या पता …
    किस राह में हो जाए
    ——– बहुत ही सुंदर रचना। उच्चस्तरीय भाव।

  2. सच है गीता जी कल किसने देखा है। किंतु आज को संवारने की कोशिश ज़रूर हमारे हाथों में है।

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