अमृत कलश

स्वर्णिम किरणों के रेशमी तार
मन सबके मनके जैसे वो हार
कितना उसको है मुझसे लाड़
सुर संगीत लिए आता सबके द्वार

सुनते हैं ऊज्ज्वलता का श्रोत वहीं
श्रृष्टि की सुन्दरता का‌ वो ही रथी
बल बुद्धि ज्ञान का भंडार सही
तभी तो अहंकार का लेश नहीं

दिनकर दरस को न तरसे कभी
इतनी ही आकांक्षा ईश से है
अमृत कलश तूं अमर रहे यही
इतनी प्रार्थना जगदीश से है

Comments

2 responses to “अमृत कलश”

  1. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    धन्यवाद जी

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