“दीपक और पतंगा”

पतंगे की कहानी:-
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शाम हुई लेकर तम को
अपने संग आई,
नहीं दिखा कुछ भी मुझको तो
माचिस ले आई.
जला दिया और गुनगुन करके
गीत सुनाया
तभी उधर से उड़कर एक
पतंगा आया
दीपक बोला:-
मत जल तू मुझसे बस थोड़ा
दूर चला जा
पतंगे ने कहा:-
परवाना हूँ मैं, तू मेरे आगोश में आ जा
तू मेरी लौ में जल करके मर जाएगा
ना पगले ! ये दीवाना तुझ बिन मर जाएगा
तेरी लौ में जलने का भी तो एक मजा है
महबूब को पाकर खो देना भी
बड़ी सजा है
पतंगे ने दीपक की लौ में कुर्बानी दे दी
दीपक ने बुझकर शोक सभा भी
कायम कर दी
रहा अंधेरा फिर ना मैंने दीप जलाया
प्रशांत में देखकर तेरी प्रतिमा
नीर बहाया…

Comments

6 responses to ““दीपक और पतंगा””

  1. सुन्दर रचना

    1. आपका धन्यवाद

  2. बहुत खूब

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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