तुम क्यों कहते हो मुझे
कवयित्री हूँ मैं
टूटा-फूटा राग हूँ और जोगन हूँ मैं
जैसे मीरा लिखती रही
भक्ति के पद रोज
वैसे मैं लिखती हूँ सदा
विरहाग्नि को कर जोड़
विरहाग्नि को कर जोड़ सदा लिखती रहती हूँ
भावों की ज्वाला में सदा
तपती रहती हूँ
मेरी कविता का सदा
भाव’ रहेगा मूल
अपसारी चिंतन प्रकृति है
संवेदना के अनुकूल…
भारतीय साहित्य:-“संवेदना के अनुकूल”
Comments
6 responses to “भारतीय साहित्य:-“संवेदना के अनुकूल””
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बहुत ख़ूब
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Tq
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सुन्दर प्रस्तुति
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Tq
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वाह
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एक भारतीय साहित्यकार में
जो गुण होने चाहिए
वह सभी गुण आपने बताए
भावात्मक रूप से आपकी कविता
की बराबरी कोई नही कर सकता
आप हर कविता ह्रदय से लिखती हैं
और दिल तक जाती हुई प्रतीत होती हैंआपकी लेखनी को नंस्कार है वंदन है..
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