अधम बन जाते बाल्मिकि

आगे बढ़ने की होड़
जन कठिनता का कारण
सीखने-सिखाने की प्रवृति बना
नर उत्तमता करता धारण

बीती बातों से नफ़रत पलता
इंसान तो हर दिन बदलता
बुराई को तजकर नित दिन
अच्छाई का करता जाता वरण

अधम बन जाते बाल्मिकि
निरक्षरता मिटती जाती है
पलती शत्रुता जिसके लिए
उसका भूत में ही होता हरन

Comments

4 responses to “अधम बन जाते बाल्मिकि”

  1. Geeta kumari

    मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती हुई बहुत सुन्दर रचना

  2. ‘अधम बन जाते बाल्मीकि’ में कवि ने भाव प्रधान कविता का सृजन किया है। कविता के भाव की लय ऐसी है जिससे पाठक सहज ही इससे जुड़ाव बना लेगा। भाव के साथ साथ कवि ने बहुत कम शब्दों में सारगर्भित बात कही है।

  3. बहुत सुंदर

  4. सरल में वाल्मीकि कवि के माध्यम से सुंदर रचना

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