गौरैया दिवस

पता नहीं कहाँ खो गई,
वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
फिर से खेलने, फुदकने को,
आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
किस की बुरी नजर है तुम पर,
यह हमको बतलाओ।
चीं-चीं चूँ-चूँ करने को,
फ़िर आँगन में आओ।
किसी बात पर गुस्सा हो क्या,
या हो तुम घबराई
कितने दिन और साल बीते,
तुम नजर ना आई।
देख कर तुमको बचपन में,
मैं कितना मुस्काती थी
छत पर रखकर कुछ दाना पानी,
तुम्हें खाते-पीते देख खिलखिलाती थी।
सुनो तुम्हारे लिए ही,
गौरैया दिवस बनाया है
आज गौरैया दिवस मनाया है।
आजा छोटी सी चिरैया,
तुमको सभी ने बुलाया है।
किसी ने भी नहीं भुलाया है।।
______✍️गीता

Comments

9 responses to “गौरैया दिवस”

  1. Satish Pandey

    पता नहीं कहाँ खो गई,
    वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
    फिर से खेलने, फुदकने को,
    आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
    ——— कवि गीता जी की लेखनी की बहुत सुंदर प्रस्तुति। भाव व शिल्प का अद्भुत समन्वय। कविता में सतत प्रवाह है, मौलिकता है, बहुत खूब।

    1. Geeta kumari

      इस शानदार और उत्साह प्रदान करने वाली सुन्दर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी, हार्दिक आभार

  2. अति उत्तम कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी

  3. कवि गीता जी की सुन्दर प्रस्तुति

    1. Geeta kumari

      हार्दिक आभार कमला जी

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏

  4. पता नहीं कहाँ खो गई,
    वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
    फिर से खेलने, फुदकने को,
    आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
    किस की बुरी नजर है तुम पर,
    यह हमको बतलाओ।
    चीं-चीं चूँ-चूँ करने को,
    फ़िर आँगन में आओ।
    ——-सुंदर भाव तथा शिल्प

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