इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
शायद उम्र का नया सा पड़ाव हो
या फिर बीते पल का हिसाब हो
नहीं तो राजनीति का झुकाव हो
वरना दमदार इंसान चुप हो ऐसे
इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
कई आशाएं कुछ पूरी ज्यादा धूमिल
उनके अपने कितने पराये व अलग
दोस्त ऐसे तो गददार किसे कहते हैं
रक्षक जिसे बनाये भक्षक बनते कैसे
इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
दोस्त सुस्त तो विकाश हो कैसे
सेवक बनकर भी अकर्मण्य भैंसे
सबका साथ हो न हो पर ऐ मालिक
ये तो ६० साल चिपके रहेंगे ऐसे
इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
,इतना मजबूर कैसे
Comments
5 responses to “,इतना मजबूर कैसे”
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समकालीन परिवेश का सही चित्रण राजीव जी।
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शायद उम्र का नया सा पड़ाव हो
या फिर बीते पल का हिसाब हो
नहीं तो राजनीति का झुकाव हो
वरना दमदार इंसान चुप हो ऐसे
—– बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ, बहुत ही खूबसूरत कविता। उत्तम शिल्प उत्तम भाव -
इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
__________बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है राजीव जी,उत्तम
शिल्प,समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बहुत सुन्दर रचना -
बहुत खूब
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इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
शायद उम्र का नया सा पड़ाव हो
या फिर बीते पल का हिसाब हो
नहीं तो राजनीति का झुकाव हो
वरना दमदार इंसान चुप हो ऐसे
इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे..
यथार्थपरक, समसामयिक रचना
उत्तम लेखन
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