सखी चली ससुराल

मेरी एक सखी चली ससुराल,
आशीष लेकर बुजुर्गों का।
गले मिलकर सखियों के,
भावी जीवन के सपने
लेकर अपनी अंखियों में
सखी चली ससुराल।
सखियों की भी दुआएँ,
लेती जाना तुम।
साजन सॅंग मिलकर,
नव-सॅंसार बसाना तुम।
पर भूल ना जाना हमको आली,
बतियाॅं वही पुरानी वाली।
याद हमें तुम आओगी ज्यादा,
भूल न जाना अपना वादा।
प्रेम-प्रीत हमारी तुम्हारी,
साजन संग मिल भूल न जाना।
अरे !अरे! रोना नहीं है,
अच्छा अब हॅंस दो ना थोड़ा
ये बन्धन ईश्वर ने जोड़ा।
याद हमें भी रखना बस तुम,
भूल ना जाना सखी प्यारी
साजन के द्वारे अब जा री॥
____✍गीता

Comments

13 responses to “सखी चली ससुराल”

  1. वाह, बहुत सुन्दर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद कमला जी

  2. Satish Pandey

    अच्छा अब हॅंस दो ना थोड़ा
    ये बन्धन ईश्वर ने जोड़ा।
    याद हमें भी रखना बस तुम,
    भूल ना जाना सखी प्यारी
    साजन के द्वारे अब जा री॥
    —- बहुत सुंदर और भावुक कर देने वाली कविता की सृष्टि हुई है। लेखनी को सैल्यूट

    1. Geeta kumari

      कविता की इतनी उत्कृष्ट और उत्साहवर्धन करती हुई समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी, अभिवादन सर

  3. बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां हैं तथा भावुक देने वाली कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी, आभार

  4. बहुत सुंदर

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद ऋषि जी

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

    1. Geeta kumari

      आभार चंद्रा जी🙏🙏

Leave a Reply

New Report

Close