भविष्य को आवाज

कूड़े के ढेर में
खोजने में लगे थे
नन्हें नन्हें हाथ,
तन्मयता के साथ,
जरूरत की चीजें,
दे रहे थे सामाजिक
जीवन को,
सच्ची सीखें।
पूछा तो बोले
उनके घरों से
निकला हुआ यह कूड़ा है
मगर हमारे लिए
कूड़ा नहीं
इस आशा से जुड़ा है
कि इसमें कुछ होगा,
जो मदद करेगा जीने में,
भूख है, इसलिये
खोजना है इंतज़ाम
क्या पता उनका फेंका हुआ
आ जाये हमारे काम।
प्लास्टिक की बोलतें
बेचकर
एक गुड़िया खरीदी है
पिछली बार,
एक थैली तो ऐसी थी
जिसमें परौठे थे चार।
एक चाबी वाला घोड़ा था
घोड़ा ठीक था लेकिन
चाबी टूटी थी,
मगर मेरी किस्मत रूठी थी
वो दूसरे बच्चे को मिल गया,
उसका चेहरा खिल गया।
मैं भी ढूंढ रहा हूँ
यह टूटी फूँकनी मिली है
उसे फूंक रहा हूँ,
सीटी बजाकर
भविष्य को आवाज दे रहा हूँ।
अपनी इच्छा की पूर्ति को
संघर्ष का आगाज कर रहा हूँ,
आज कीचड़ में सना हूँ
कल कमल बन खिलूँगा
एक दिन आपसे
इंसान बन मिलूँगा।

Comments

4 responses to “भविष्य को आवाज”

  1. Geeta kumari

    संघर्ष का आगाज कर रहा हूँ,
    आज कीचड़ में सना हूँ
    कल कमल बन खिलूँगा
    एक दिन आपसे
    इंसान बन मिलूँगा।
    ________ अभावों भरे जीवन में भी संघर्ष करके जीने की बहुत सुंदर भावना दर्शाती हुई कवि सतीश जी की उच्च स्तरीय रचना, भाव और शिल्प अति उत्तम, लाजवाब अभिव्यक्ति।

    1. Amita Gupta

      आज कीचड़ में सना हूं कल कमल बन खिलूंगा
      एक दिन आप से इंसान बन मिलूंगा।

  2. Amita Gupta

    उच्च स्तरीय रचना ,
    बेहद शानदार🙏🏻🙏🏻

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