जमाना

बीत गया है ख़ुशी और गम बांटने का जमाना
पागलपन है अकेले ही हंसना रोना गुनगुनाना
काटते हैं ये जब इन्हें बांटते नहीं हैं
कितना मुश्किल है अब सुनना और सुनाना
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है मगर सब मौन
कोई मतलब नहीं रहा जिए या मरे जमाना
कह नहीं पा रहे कहे बिन रह नहीं पा रहे जारी है जीवन में सुख दुख का आना जाना
खड़े हैं मेले में अकेले अकेले से
कितना मुश्किल है अपने को पहचान पाना
मर गये हैं संवाद और संवेदना आज के इस दौर
बेहोश समझ कर मकसद था इन्हे जीवित कराना
मशीनों से मुहब्बत कहे या यंत्रों की गुलामी
पानी सा फोन दिखता और मीन सा जमाना
दुनिया ये काम में अब व्यस्त है इतना
प्रचलन में नहीं लोरिया सुनना व सुनाना
बोझा सा ढोके थक रहे अपनों को अपने लोग
गूगल गुरु से पूंछःते वृद्ध आश्रम ठिकाना
नाते व रिश्ते आज औपचारिक हुए
भूलते ही गए लोग अब इनको निभाना
नफरत की लताओ से पादप घिरे हुए
कितना है मुश्किल शाख से अब वंशी बनाना

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Comments

3 responses to “जमाना”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

  2. अति उत्तम अभिव्यक्ति

  3. vikash kumar

    नफरत की लताओ से पादप घिरे हुए
    कितना है मुश्किल शाख से अब वंशी बनाना

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