हे प्रभु इतना दे मुझे,
ना फैलें किसी के आगे हाथ
देने को आतुर रहें
हर मानव का साथ,
हर मानव का साथ मैं दूं
आगे बढ़-चढ़कर
निस्सहाय की सहायता करूं
मैं हँस हँस कर
जो मांगे मेरी रोटी तो
दे दूँ थाली
भले ही मेरा पेट रहे बिल्कुल खाली।।
निस्सहाय की सहायता करूं…

Comments
6 responses to “निस्सहाय की सहायता करूं…”
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सुंदर भाव
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Thanks dear
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कविता के संग चित्र की मिलाप बहुत ही सुन्दर है। अति उत्तम भाव प्रकट किया है आपने।
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इतनी सुन्दर समीक्षा की है आपने
कि मन प्रफुल्लित हो गया है
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अतिसुंदर भाव
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धन्यवाद
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