Antariksha Saha, Author at Saavan - Page 2 of 11's Posts

वक़्त

वक़्त का क्या है कट जाता है जनाब जिस वक़्त पर तुम्हे गुरुर है वोह भी कट जाएगा »

दुश्मन

तुम लोगों से अच्छे दुश्मन है कम से कम दोस्त होने का दावा तोह नहीं करते »

गुरुर

इतना गुरुर ना कर अपनी खुबसुरती पड़ यह तोह उम्र के साथ चला जायेगा जितना उस खुदा ने प्यार और शिद्दत ने तुझे बनाया काश उतना अच्छा दिल दिया होता तोह इतनी ज़िंदगियां बर्बाद ना होती »

अधूरी सी कविता

तेरे जाने पे खुद को समेट लिया था सोचा था ज़िन्दगी खत्म है ना नींद थी ना चैन था इश्क़ इबादत थी कभी ना रैन था बात दिल की लफ़्ज़ों में थी पर लब पे खामोशी सी थी सच कह रहा तेरी कसम आज भी सपनों मैं तेरी राह तकता हूँ ज़िन्दगी के और कुछ पल खुदा ज़रूर लिखता तोह उसका क्या बिगड़ता मन के किसी कोने में आज भी मुलाकात की उम्मीद रखता हूँ »

मौला

साद और बर्बाद भी हुआ मौला प्यार भी किया नफरत भी किया मौला गुनाह भी किया मौला शफा भी किया अंत में रुका जहा तोह पिटारा खाली था जो कमाया वोह रह गया मौला तू कही भी नहीं दिखा मौला बस लोग थे गिने चुने हर बंदे मै तेरा अक्स है शायद और मै मन्दिर मस्जिद तुझे छानता फिरा काश कुछ पल होते कुफरत के होते कुछ लोगों का भला भी हम करते मौत के बाद का पता नहीं कुछ लोगों के चेहरे की मुस्कान की वजह बनते कुफरत-क्रूसेड साद... »

गम है तोह

गम है तोह रो ले चेहरा पढ़ के दिल का हाल जाने वाले अभी कहा बनते है »

बारिश की पहली बूंद सी

बारिश की पहली बूंद सी सुकून दे जाती तू इस तपती धरती को जीने के और मौके दे जाती तू लाखों वजूहात थे नफ़रतें थी सब धूल गए अब बस तुझमे घुल जाने को दिल करता है बारिश के तेरे उस सहलाब मैं खो जाने को दिल करता है पहली बारिश की तरह आज भी तेरी आस देखता हूँ अपने आप में खुशनुमा तोह एक स्वांग है आज भी तेरी राह देखता हूँ »

ज़िन्दगी कोरा कागज़ थी हमारी

ज़िन्दगी कोरा कागज़ थी हमारी तुमने कुछ रंग भर दिए आये हो तोह रुक जाओ इतनी जल्दी क्या जाने की पर रोक तोह हम सकते नही वरना रब बुरा मान जाएगा उसे भी तोह अच्छे लोगों की जरूरत है एक मैं ही महिरूह सा रह गया रंगों के बौछार के बावजूद एक मैं ही बेरंग सा रह गया »

फुरक़त

जब फुरक़त हुई तोह पता चला काश फुरसत से अगर तुझे चाहा होता »

बेगाने

चले थे हम भी साथ ही तोह तुम आगे हम पीछे रह गए ज़िन्दगी ने तुम्हे सहारा दिया हमे अंधेरा इसमे कोई मलाल नहीं पर कभी तोह पीछे मुड़कर तुम देखते एक आध चाय के जाम हम छलकाते आखिर कभी यारी थी हमारी »

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